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बिजली प्लांट राखड़ की शत-प्रतिशत उपयोगिता सुनिश्चित नहीं कर पा रहे

राखड़ ट्रांसपोर्टिंग में भी बड़ा खेल

कोरबा ll जिले के बिजली प्लांटों से निकलने वाले राखड़ का निपटारा एक बड़ी चुनौती है। इस समस्या से निपटने बिजली प्लांटों को राखड़ के शत प्रतिशत उपयोगिता सुनिश्चित करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। एक प्रकार से देखा जाए तो राख की उपयोगिता के मामले में जिले के कई बिजली प्लांट फेल हैं। इससे न सिर्फ पर्यावरण बल्कि लोगों की सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

बिजली प्लांटो के ऐश डायक भर चुके हैं और नए डेम के लिए जगह नहीं रही। इससे निपटने कोयला खदानों के बंद हिस्से में राख भरने की योजना पर काम शुरू हुआ है। लेकिन इसके बाद भी बिजली प्लांट राखड़ की शत-प्रतिशत उपयोगिता सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं। भविष्य मे परेशानी और बढ़ेगी, जिससे निपटना मुश्किल होगा। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार बीते एक साल में जितना राखड़ जिले के बिजली प्लांटों से निकला उसका उपयोग नहीं हो पाया। राखड़ के उपयोग के मामले में फेल बिजली प्लांटों को पहले भी एनजीटी नोटिस थमा चुका है।

राखड़ डेम भी भर गए, ऊंचाई बढा़ चला रहे काम

जिले में 13 बिजली प्लांट हैं। लेकिन राख की उपयोगिता के मामले में प्रमुख बिजली प्लांट जैसे एनटीपीसी, एचटीपीपी, डीएसपीएम, प्लांट पीछे चल रहे हैं। इन प्लांटों से उत्सर्जित राखड़ की उपयोगिता 60 फीसदी से कम हैं। कोरबा पूर्व व बालको में भी समस्या हैं। बिजली प्लांटों के लिए बने सभी राखड़ डेम फुल हो चुके हैं। बिजली उत्पादन के लिए बांधों की ऊंचाई बढ़ाकर किसी तरह से काम चलाया जा रहा है।

बंद खदानों में धीमि गति से राखड़ डालना किया शुरू, फिर भी समस्या दूर नहीं

बिजली प्लांटों से निकलने वाले राख की एक तरफ जहां शत-प्रतिशत उपयोग नहीं हो रहा हैं। वहीं दूसरी तरफ एसईसीएल की बंद खदानों में राखड़ डालने की शुरुआत की गई है। एनटीपीसी पहले से ही सुराकछार माइंस के बंद हिस्से में राख डाल रहा है। वहीं अब मानिकपुर में भी एनटीपीसी, एचटीपीपी, डीएसपीएम, कोरबा पूर्व प्लांट से राख लाकर डाला जा रहा है। मानिकपुर खदान में 27 मिलियन टन राख भरना है। जबकी सूत्रों के हवाले से यह जानकारी मिल रही है कि मानिकपुर खदान में अभी 50% भी नहीं भर पाया हैl इसे भरने में अभी 4 से 5 साल का वक्त और लग सकता हैl

प्रदूषण की समस्या के साथ प्लांट प्रबंधन राखड़ की उपयोगिता ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, दी है हिदायत:

पर्यावरण संरक्षण मंडल के जिला अधिकारी ने कहा कि बिजली प्लांट प्रबंधन राखड़ की उपयोगिता ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। समस्या हो रही है। इसके लिए प्लांटों को हिदायत दी है। निर्धारित समय तक उन्होंने इस पर नियंत्रण पाने की बात कही है। बंद खदानों में राखड़ डालना भी शुरू कर दिया है।

पर्यावरण विभाग की सख्ती का भी असर नहीं, प्लांटाें काे दी चेतावनी

एक साल में राखड़ का एनटीपीसी कोरबा मे कितना उपयोग FY 2022-23

अभी रख डेम की क्या स्थिति है – 6th raising चल रहा

प्लांटों से निकला राख- 5457278

एश डायक डाला गया- 1196191

खदानों में भरा गया- 252568

ईंट निर्माण पर उपयोग- 73490

सीमेंट के लिए सप्लाई- 0

भूमि-भराव के लिए – 3636

अन्य उपयोग- 1271602 (सड़क निर्माण)

टोटल राख उपयोग – 2797487                                                         (नोट-आंकड़े मिट्रिक टन में )

अफसर बदलते हैं बदल जाती है कार्य प्रणाली

नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन (एनटीपीसी) कोरबा संयंत्र से रेलवे वैगन के माध्यम से सीधे सीमेंट फैक्ट्री में राख सप्लाई की जाएगी। इसके लिए डाइ ऐश साइलो का निर्माण किया जा रहा है। दो वर्ष में यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा। इसके साथ ही एसईसीएल की तीन भूमिगत परियोजना ढेलवाडीह, सिंघाली व बगदेवा में भी राख भरने के लिए डायरेक्टर जनरल आफ माइंस सेफ्टी (डीजेएमएस) से अनुमति मांगी गई है उक्त बातें मार्च 2021 में एनटीपीसी के सभाकक्ष में तत्कालिन मुख्य महाप्रबंधक विश्वरूप बसु ने कहि थीl जब की अभी तक ऐश के सप्लाई सीमेंट फैक्ट्री में  नहीं हो पाई हैl

एनटीपीसी कोरबा ने वन विभाग से कोरिया घाट के पास चार सौ एकड़ जमीन मांगी थी। एनटीपीसी प्रबंधन जमीन पर राखड़ डेम बनाने की योजना बना रहा था। तत्कालिन सीसीएफ डी आनंद बाबू ने कोरबा वन मंडल के अधिकारियों के साथ मौके का निरीक्षण किया था। मामले में एनटीपीसी अधिकारियों के साथ विस्तार से चर्चा की गई थी।

एनटीपीसी कोरबा द्वारा पूर्व में 2100 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा था। संयंत्र विस्तार के तहत 500 मेगावाट की एक इकाई और स्थापित की गई। क्षमता बढ़कर 2600 मेगावाट हो गई है। बिजली उत्पादन के लिए 40 हजार टन कोयला प्रतिदिन जलाया जाता है। इससे 15 प्रतिशत राख निकलती है। इसे रखने के लिए राखड़ डेम का निर्माण किया गया। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार वर्तमान राखड़ डेम में राख रखने के लिए जगह की कमी सामने आ रही है। डेम का उपयोग अधिक से अधिक दो साल तक किया जा सकेगा।

इसे ध्यान में रखते हुए कोरिया घाट में जमीन चिंहित करके इसकी मांग शासन से की गई थी। जमीन उपलब्ध होते ही राखड़ डेम बनाने की प्रक्रिया अपनाई जाति। इस सिलसिले में वन अधिकारियों ने मौका मुआयना भी किया था।

रोज कई गाड़ी आ-जा रहीं,कोई देखने वाला नहीं

बिजली संयंत्र अपने ठेकेदार के साथ अनुमती करार करते हैं जिनमें एक शुल्क निर्धारित होता है और इन्हें इतना मिलियन टन बिजली के संयंत्र से राखड़ उठना होता है और बताए गए जगह पर गिराना होता है  इसके बाद खेल शुरू हो जाता है ठेकेदारों की मिलीभगत से ड्राइवर कहीं भी राखडं फेंक देते हैं या व्यक्तिगत पैसे लेकर किसी के जमीन पर डाल देते हैं ऐसा करके डीजल बचा लेते हैं, क्योंकि शहर में कई जगह आपको राखंड दिखाई दे रहे हैं इनमें अंकुश लगाने वाला कोई नहींl

राख से हो रहीं गंभीर बीमारियां 

इलाके के 70 वर्षीय यूसुफ खान बताते हैं कि राख के कारण शरीर में बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है. आंख में डस्ट चली जाती है, जब खाना खाते हैं तब उसमें भी राख आ जाती है. बाहर की हवा अब सांस लेने के लायक भी नहीं बची है. घर परिवार के लोग इसी राख की वजह से दमा, अस्थमा, एलर्जी जैसे गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं. वहीं, इसी इलाके की निवासी सीताबाई बताती हैं कि बांध की राख हवा में उड़कर घर में आ जाती है. खाना, पानी में भी राख चली जाता है. अब तो हमें इसी माहौल में जीने की आदत हो गई है.

सुविधाएं देने का किया था वादा, लेकिन मिला कुछ भी नहीं

इलाके के स्थानीय लोग बताते हैं कि जब NTPC का यहां राख बांध स्थापित हो रहा था, तब अफसरों ने इलाके के विकास का सपना दिखाया था, राखड़ बांध बनकर तैयार तो हो गया लेकिन यहां के लोग राख की वजह से घर में कैद होने व पलायन करने को मजबूर हो गयेl

एनटीपीसी कोरबा जनसंपर्क अधिकारी ने डेटा तो उपलब्ध कराये, मगर इस बारे में कुछ नहीं कहाl

 

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